Meri Tarha
[00:27.19] हर रोज़ सुबह उठता हूँ, मगर क्यूँ नींद ना आती रातों में?
[00:30.19] खाली हैं दीवारें कमरे की, और जंग लगी दरवाज़ों में
[00:33.94] हाँ, मैं हूँ जो क़ैद है मुझमें, मैं हूँ निराश
[00:36.69] जो खुद से सबको दिखाता राहें और गुमशुदा हूँ अपनी राहों में
[00:40.69] क्या मोड़ है जिसपे ठहरा हूँ? मैं कब से खुद को कह रहा हूँ
[00:43.94] कि कल से बदल दूँगा खुद को, पर रोज़ मैं खुद को सह रहा हूँ
[00:47.19] मैं हारा हूँ, जो टूट गया गर्दिश में मैं वो तारा हूँ
[00:50.44] हाँ, कल से बदल दूँगा खुद को, पर रोज़ मैं खुद को सह रहा हूँ
[01:04.19] मेरी तरह क्या तुम भी खुद को ही तराशते? (तराशते)
[01:06.94] वो गुज़रे वक्त की क्या ग़लतियाँ सुधारते? (सुधारते)
[01:10.19] हाँ, महफ़िलों में अपनी खुशियाँ सारी बाँट के (बाँट के)
[01:13.20] क्या तुम भी रातें सारी तन्हा ही गुज़ारते? (गुज़ारते)
[01:17.19] हाँ, चीख़ रहा हूँ आँखों से, नरमी है मेरी इन बातों में
[01:19.95] सपने हैं मेरे, और खुद ही गला मैं घोंट रहा हूँ हाथों से
[01:23.44] अब और नहीं सहना, ये राज़ कहूँ मैं ग़ैरों से
[01:26.94] मैं खुश हूँ ज़िंदगी से, ये झूठ कहूँ घर वालों से
[01:30.44] कैसा डर मेरे अंदर? थर-थर काँप रही मेरी नस-नस
[01:32.44] बंजर ख़्वाब लगें अब हर-दम, अब बस ताने कसें सब हँस-हँस
[01:36.94] हाँ, मैंने जो किए वादे हैं, अब तक वो सभी आधे हैं
[01:40.44] नज़रें ही झुका लेता हूँ, अपने जो नज़र आते हैं
[01:43.69] महलों के संगमरमर पे मैंने कंगन टूटते देखे हैं
[01:45.94] और छोटी चार-दीवारों में माँ-बाप वो हँसते देखे हैं
[01:47.69] तो क्या है क़ामयाबी? क्या है ज़िंदगानी?
[01:54.69] राहें चुनूँ मैं कैसी? सवाल मुझ पे भारी
[01:56.44] मैं आसमाँ में राहतें क्यूँ ढूँढता हूँ बेवजह?
[02:04.20] हैं रंजिशें मेरी दुआ, है बेख़बर मेरा खुदा
[02:07.94] जितनी भी शिकायत है, ये खुद नादिर की कमी है (कमी है)
[02:20.44] जैसी भी ये आस है, बस मेहनत के ही रंग ढली है (ढली है)
[02:26.44] चादर जो ओढ़ के सोया, जग से कहाँ वाक़िफ़ है (वाक़िफ़ है)
[02:33.44] ठहरा हूँ आज में ही, मुझे कल की भी कुछ तो खलिश है (खलिश है)
[03:07.94] हाँ, माना दर्द है, अभी मैं कुछ बना नहीं
[03:10.69] शायद मैं सपनों के लिए कभी लड़ा नहीं
[03:14.44] गिर जाएगा वो ख़्वाहिशों का घर मुझ पे ही
[03:17.44] अगर मैं आज अपने बिस्तर से उठा नहीं
[03:20.94] कोशिश करूँगा बस कल से बेहतर बन सकूँ
[03:24.44] अगर फ़िसल गया तो खुद ही मैं सँभल सकूँ
[03:27.70] गँवाऊँ वक्त ना वो बीती बातें सोचकर
[03:31.44] कभी रुकूँ ना, चाहे धीमे ही क़दम चलूँ
[03:35.19] मेरी तरह क्या तुम भी खुद को ही तराशते? (तराशते)
[03:38.69] वो गुज़रे वक्त की क्या ग़लतियाँ सुधारते? (सुधारते)
[03:42.19] हाँ, महफ़िलों में अपनी खुशियाँ सारी बाँट के (बाँट के)
[03:45.44] क्या तुम भी रातें सारी तन्हा ही गुज़ारते? (गुज़ारते)
