Meri-Bhawna-Rajendra-Jain
[00:32.70] जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया
[00:40.40] सब जीवोको मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया
[00:48.37] बुध्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रम्हा, या उसको स्वाधीन कहो
[00:56.60] भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ||1||
[01:05.37] विषयो की आशा नहि जिनके साम्य भाव धन रखते हैं
[01:29.02] निज परके हित-साधन में जो निश दिन तत्पर रहते हैं
[01:36.75] स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं
[01:45.24] ऐसे ज्ञानी साधू जगत के दुःख समूह को हरते हैं ||2||
[01:55.37] रहे सदा सत्संग उन्ही का ध्यान उन्ही का नित्य रहे हैं
[02:17.42] उन्ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे हैं
[02:25.65] नहीं सताऊ किसी जीव को झूठ कभी नहीं कहा करू
[02:34.15] परधन वनिता पर न लुभाऊ, संतोशामृत पीया करू ||3||
[02:42.41] अहंकार का भाव न रखु नहीं किसी पर क्रोध करू
[02:48.00] देख दुसरो की बढती को कभी न इर्ष्या भाव धरु
[02:53.06] रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यव्हार करू
[02:54.92] बने जहा तक इस जीवन में, औरो का उपकार करू||4||
[02:57.29] मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवो से नित्य रहे
[03:06.33] दींन दुखी जीवो पर मेरे उर से करुना – स्रोत बहे
[03:14.29] दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतो पर क्षोभ नहीं मुझको आवे
[03:22.54] साम्यभाव रखु में उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ||5||
[03:31.57] गुनी जनों को देख ह्रदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे
[03:56.27] बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे
[04:03.45] होऊ नहीं कृतघ्न कभी में द्रोह न मेरे उर आवे
[04:11.95] गुण ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टी न दोषों पर जावे ||6||
[04:27.62] कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आवे या जावे
[04:44.36] लाखों वर्षो तक जीउ या मृत्यु आज ही आ जावे
[04:52.06] अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे
[05:00.02] तो भी न्याय मार्ग से मेरा कभी न पद डिगने पावे ||7||
[05:24.41] होकर सुख में मग्न न फूले दुःख में कभी न घबरावे
[05:33.44] पर्वत नदी श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे
[05:42.22] रहे अडोल अकंप निरंतर यह मन द्रिन्तर बन जावे
[05:47.79] इस्ट वियोग अनिस्ठ योग में सहन- शीलता दिखलावे ||8||
[05:56.29] सुखी रहे सब जीव जगत के कोई कभी न घबरावे
[06:20.50] बैर पाप अभिमान छोड़ जग नित्य नए मंगल गावे
[06:28.47] घर घर चर्चा रहे धर्मं की दुष्कृत दुष्कर हो जावे
[06:36.44] ज्ञान चरित उन्नत कर अपना मनुज जन्म फल सब पावे ||9||
[06:55.79] इति भीती व्यापे नहीं जग में वृष्टी समय पर हुआ करे
[07:08.91] धर्मनिस्ट होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे
[07:16.62] रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले प्रजा शांति से जिया करे
[07:24.85] परम अहिंसा धर्म जगत में फ़ैल सर्व हित किया करे ||10||
[07:48.38] फैले प्रेम परस्पर जगत में मोह दूर हो राह करे
[07:57.52] अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहीं कोई मुख से कहा करे
[08:04.69] बनकर सब “युगवीर” ह्रदय से देशोंनती रत रहा करें
[08:12.55] वस्तु स्वरुप विचार खुशी से सब संकट सहा करे ||11||
[08:20.64] रहे भावना ऐसी मेरी ....
