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Rashmirathi

Ashutosh rana
[05:42.02]·
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[00:37.36] वर्षों तक वन में घूम-घूम,

[00:38.95] बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,

[00:40.29] सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,

[00:41.88] पांडव आये कुछ और निखर।

[00:43.47] सौभाग्य न सब दिन सोता है,

[00:45.07] देखें, आगे क्या होता है।

[00:49.33] मैत्री की राह बताने को,

[00:50.41] सबको सुमार्ग पर लाने को,

[00:52.00] दुर्योधन को समझाने को,

[00:53.33] भीषण विध्वंस बचाने को,

[00:55.19] भगवान् हस्तिनापुर आये,

[00:57.04] पांडव का संदेशा लाये।

[01:00.27] ‘दो न्याय अगर तो आधा दो,

[01:06.37] पर, इसमें भी यदि बाधा हो,

[01:08.33] तो दे दो केवल पाँच ग्राम,

[01:09.93] रक्खो अपनी धरती तमाम।

[01:11.51] हम वहीं खुशी से खायेंगे,

[01:13.11] परिजन पर असि न उठायेंगे!

[01:15.50] दुर्योधन वह भी दे ना सका,

[01:21.61] आशीष समाज की ले न सका,

[01:22.97] उलटे, हरि को बाँधने चला,

[01:24.82] जो था असाध्य, साधने चला।

[01:26.67] जब नाश मनुज पर छाता है,

[01:28.53] पहले विवेक मर जाता है।

[01:37.86] हरि ने भीषण हुंकार किया,

[01:39.19] अपना स्वरूप-विस्तार किया,

[01:40.53] डगमग-डगमग दिग्गज डोले,

[01:42.11] भगवान् कुपित होकर बोले-

[01:44.23] ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,

[01:45.84] हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

[01:50.10] यह देख, गगन मुझमें लय है,

[01:51.42] यह देख, पवन मुझमें लय है,

[01:52.75] मुझमें विलीन झंकार सकल,

[01:54.35] मुझमें लय है संसार सकल।

[01:56.21] अमरत्व फूलता है मुझमें,

[01:58.06] संहार झूलता है मुझमें।

[01:59.65] ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,

[02:01.25] भूमंडल वक्षस्थल विशाल,

[02:02.86] भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,

[02:04.98] मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।

[02:08.44] दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,

[02:10.03] सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

[02:12.15] ‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,

[02:13.76] मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,

[02:15.36] चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,

[02:17.78] नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।

[02:18.85] शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,

[02:19.65] शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

[02:21.78] ‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,

[02:22.58] शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,

[02:23.37] शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,

[02:24.97] शत कोटि दण्डधर लोकपाल।

[02:26.03] जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,

[02:29.75] हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

[02:34.27] ‘भूलोक, अतल, पाताल देख,

[02:35.62] गत और अनागत काल देख,

[02:37.22] यह देख जगत का आदि-सृजन,

[02:40.40] यह देख, महाभारत का रण,

[02:42.03] मृतकों से पटी हुई भू है,

[02:44.16] पहचान, इसमें कहाँ तू है।

[02:47.61] ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,

[02:50.01] पद के नीचे पाताल देख,

[02:50.81] मुट्ठी में तीनों काल देख,

[02:51.61] मेरा स्वरूप विकराल देख।

[02:53.22] सब जन्म मुझी से पाते हैं,

[02:54.56] फिर लौट मुझी में आते हैं।

[02:59.39] ‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,

[03:01.26] साँसों में पाता जन्म पवन,

[03:03.11] पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,

[03:06.33] हँसने लगती है सृष्टि उधर!

[03:07.92] मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,

[03:09.78] छा जाता चारों ओर मरण।

[03:12.44] ‘बाँधने मुझे तो आया है,

[03:14.04] जंजीर बड़ी क्या लाया है?

[03:20.94] यदि मुझे बाँधना चाहे मन,

[03:26.53] पहले तो बाँध अनन्त गगन।

[03:29.46] सूने को साध न सकता है,

[03:31.58] वह मुझे बाँध कब सकता है?

[03:40.61] ‘हित-वचन नहीं तूने माना,

[03:43.00] मैत्री का मूल्य न पहचाना,

[03:45.70] तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,

[03:48.09] अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।

[03:49.69] याचना नहीं, अब रण होगा,

[03:52.08] जीवन-जय या कि मरण होगा।

[03:55.00] ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

[03:56.33] बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,

[03:59.00] फण शेषनाग का डोलेगा,

[04:01.39] विकराल काल मुँह खोलेगा।

[04:03.00] दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

[04:05.67] फिर कभी नहीं जैसा होगा।

[04:07.00] ‘भाई पर भाई टूटेंगे,

[04:09.14] विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,

[04:11.26] वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,

[04:11.80] सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।

[04:22.71] आखिर तू भूशायी होगा,

[04:23.76] हिंसा का पर, दायी होगा।’

[04:27.22] थी सभा सन्न, सब लोग डरे,

[04:38.11] चुप थे या थे बेहोश पड़े।

[04:45.83] केवल दो नर ना अघाते थे,

[04:46.89] धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।

[04:52.47] कर जोड़ खड़े प्रमुदित,

[04:53.53] निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!