Rashmirathi
[00:37.36] वर्षों तक वन में घूम-घूम,
[00:38.95] बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
[00:40.29] सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
[00:41.88] पांडव आये कुछ और निखर।
[00:43.47] सौभाग्य न सब दिन सोता है,
[00:45.07] देखें, आगे क्या होता है।
[00:49.33] मैत्री की राह बताने को,
[00:50.41] सबको सुमार्ग पर लाने को,
[00:52.00] दुर्योधन को समझाने को,
[00:53.33] भीषण विध्वंस बचाने को,
[00:55.19] भगवान् हस्तिनापुर आये,
[00:57.04] पांडव का संदेशा लाये।
[01:00.27] ‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
[01:06.37] पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
[01:08.33] तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
[01:09.93] रक्खो अपनी धरती तमाम।
[01:11.51] हम वहीं खुशी से खायेंगे,
[01:13.11] परिजन पर असि न उठायेंगे!
[01:15.50] दुर्योधन वह भी दे ना सका,
[01:21.61] आशीष समाज की ले न सका,
[01:22.97] उलटे, हरि को बाँधने चला,
[01:24.82] जो था असाध्य, साधने चला।
[01:26.67] जब नाश मनुज पर छाता है,
[01:28.53] पहले विवेक मर जाता है।
[01:37.86] हरि ने भीषण हुंकार किया,
[01:39.19] अपना स्वरूप-विस्तार किया,
[01:40.53] डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
[01:42.11] भगवान् कुपित होकर बोले-
[01:44.23] ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
[01:45.84] हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
[01:50.10] यह देख, गगन मुझमें लय है,
[01:51.42] यह देख, पवन मुझमें लय है,
[01:52.75] मुझमें विलीन झंकार सकल,
[01:54.35] मुझमें लय है संसार सकल।
[01:56.21] अमरत्व फूलता है मुझमें,
[01:58.06] संहार झूलता है मुझमें।
[01:59.65] ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
[02:01.25] भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
[02:02.86] भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
[02:04.98] मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
[02:08.44] दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
[02:10.03] सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
[02:12.15] ‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
[02:13.76] मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
[02:15.36] चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
[02:17.78] नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
[02:18.85] शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
[02:19.65] शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
[02:21.78] ‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
[02:22.58] शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
[02:23.37] शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
[02:24.97] शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
[02:26.03] जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
[02:29.75] हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।
[02:34.27] ‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
[02:35.62] गत और अनागत काल देख,
[02:37.22] यह देख जगत का आदि-सृजन,
[02:40.40] यह देख, महाभारत का रण,
[02:42.03] मृतकों से पटी हुई भू है,
[02:44.16] पहचान, इसमें कहाँ तू है।
[02:47.61] ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
[02:50.01] पद के नीचे पाताल देख,
[02:50.81] मुट्ठी में तीनों काल देख,
[02:51.61] मेरा स्वरूप विकराल देख।
[02:53.22] सब जन्म मुझी से पाते हैं,
[02:54.56] फिर लौट मुझी में आते हैं।
[02:59.39] ‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
[03:01.26] साँसों में पाता जन्म पवन,
[03:03.11] पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
[03:06.33] हँसने लगती है सृष्टि उधर!
[03:07.92] मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
[03:09.78] छा जाता चारों ओर मरण।
[03:12.44] ‘बाँधने मुझे तो आया है,
[03:14.04] जंजीर बड़ी क्या लाया है?
[03:20.94] यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
[03:26.53] पहले तो बाँध अनन्त गगन।
[03:29.46] सूने को साध न सकता है,
[03:31.58] वह मुझे बाँध कब सकता है?
[03:40.61] ‘हित-वचन नहीं तूने माना,
[03:43.00] मैत्री का मूल्य न पहचाना,
[03:45.70] तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
[03:48.09] अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
[03:49.69] याचना नहीं, अब रण होगा,
[03:52.08] जीवन-जय या कि मरण होगा।
[03:55.00] ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
[03:56.33] बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
[03:59.00] फण शेषनाग का डोलेगा,
[04:01.39] विकराल काल मुँह खोलेगा।
[04:03.00] दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
[04:05.67] फिर कभी नहीं जैसा होगा।
[04:07.00] ‘भाई पर भाई टूटेंगे,
[04:09.14] विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
[04:11.26] वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
[04:11.80] सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
[04:22.71] आखिर तू भूशायी होगा,
[04:23.76] हिंसा का पर, दायी होगा।’
[04:27.22] थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
[04:38.11] चुप थे या थे बेहोश पड़े।
[04:45.83] केवल दो नर ना अघाते थे,
[04:46.89] धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
[04:52.47] कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
[04:53.53] निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!
