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Ramcharit Manas 317-319

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[07:31.23]·Synced by Guest·
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[00:19.39] अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।

[00:33.57] बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥

[00:36.31] एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।

[00:43.15] रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥

[00:51.64] चौपाई :

[00:57.67] सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।

[01:07.64] चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥317॥

[01:34.14] बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥

[01:53.48] पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥1॥

[02:03.75] सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥

[02:14.30] कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥2॥

[02:30.19] बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥

[02:39.91] सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सजह सयानी॥3॥

[02:49.93] कपट नारि बर बेष बनाई। मिली सकल रनिवासहिं जाई॥

[03:00.13] करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानीं॥4॥

[03:14.61] छन्द : * को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।

[03:22.47] कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥

[03:29.92] आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकलहियँ हरषित भई।

[03:37.33] अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥

[03:52.68] दोहा : * जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।

[04:02.28] सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥318॥

[04:32.90] चौपाई : * नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥

[04:45.57] बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥1॥

[04:58.39] * पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥

[05:07.97] करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥2॥

[05:23.08] * दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥

[05:35.57] समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥3॥

[05:48.11] * नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥

[06:00.36] एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥4॥

[06:20.17] छन्द : * बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।

[06:27.57] मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥

[06:35.26] ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।

[06:42.90] अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥

[06:54.38] दोहा : *नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।

[07:07.07] मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥319॥