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Meri tarah

Akhil reedu
[04:04.64]·
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[00:27.42] हर रोज़ सुबह उठता हूँ, मगर क्यूँ नींद ना आती रातों में?

[00:30.38] खाली हैं दीवारें कमरे की, और जंग लगी दरवाज़ों में

[00:33.56] हाँ, मैं हूँ जो क़ैद है मुझमें, मैं हूँ निराश

[00:37.30] जो खुद से सबको दिखाता राहें और गुमशुदा हूँ अपनी राहों में

[00:41.01] क्या मोड़ है जिसपे ठहरा हूँ? मैं कब से खुद को कह रहा हूँ

[00:44.21] कि कल से बदल दूँगा खुद को, पर रोज़ मैं खुद को सह रहा हूँ

[00:47.40] मैं हारा हूँ, जो टूट गया गर्दिश में मैं वो तारा हूँ

[00:50.85] हाँ, कल से बदल दूँगा खुद को, पर रोज़ मैं खुद को सह रहा हूँ

[01:03.86] मेरी तरह क्या तुम भी खुद को ही तराशते? (तराशते)

[01:06.56] वो गुज़रे वक्त की क्या ग़लतियाँ सुधारते? (सुधारते)

[01:10.28] हाँ, महफ़िलों में अपनी खुशियाँ सारी बाँट के (बाँट के)

[01:13.75] क्या तुम भी रातें सारी तन्हा ही गुज़ारते? (गुज़ारते)

[01:17.20] हाँ, चीख़ रहा हूँ आँखों से, नरमी है मेरी इन बातों में

[01:20.41] सपने हैं मेरे, और खुद ही गला मैं घोंट रहा हूँ हाथों से

[01:23.59] अब और नहीं सहना, ये राज़ कहूँ मैं ग़ैरों से

[01:27.05] मैं खुश हूँ ज़िंदगी से, ये झूठ कहूँ घर वालों से

[01:33.69] कैसा डर मेरे अंदर? थर-थर काँप रही मेरी नस-नस

[01:34.75] बंजर ख़्वाब लगें अब हर-दम, अब बस ताने कसें सब हँस-हँस

[01:37.41] हाँ, मैंने जो किए वादे हैं, अब तक वो सभी आधे हैं

[01:41.14] नज़रें ही झुका लेता हूँ, अपने जो नज़र आते हैं

[01:44.59] महलों के संगमरमर पे मैंने कंगन टूटते देखे हैं

[01:47.52] और छोटी चार-दीवारों में माँ-बाप वो हँसते देखे हैं

[01:51.27] तो क्या है क़ामयाबी? क्या है ज़िंदगानी?

[01:54.72] राहें चुनूँ मैं कैसी? सवाल मुझ पे भारी

[01:57.64] मैं आसमाँ में राहतें क्यूँ ढूँढता हूँ बेवजह?

[02:04.29] हैं रंजिशें मेरी दुआ, है बेख़बर मेरा खुदा

[02:12.52] जितनी भी शिकायत है, ये खुद नादिर की कमी है (कमी है)

[02:19.16] जैसी भी ये आस है, बस मेहनत के ही रंग ढली है (ढली है)

[02:25.80] चादर जो ओढ़ के सोया, जग से कहाँ वाक़िफ़ है (वाक़िफ़ है)

[02:32.44] ठहरा हूँ आज में ही, मुझे कल की भी कुछ तो खलिश है (खलिश है)

[03:08.56] हाँ, माना दर्द है, अभी मैं कुछ बना नहीं

[03:10.69] शायद मैं सपनों के लिए कभी लड़ा नहीं

[03:14.14] गिर जाएगा वो ख़्वाहिशों का घर मुझ पे ही

[03:17.34] अगर मैं आज अपने बिस्तर से उठा नहीं

[03:21.05] कोशिश करूँगा बस, कल से बेहतर बन सकूँ

[03:24.23] अगर फ़िसल गया तो खुद ही मैं सँभल सकूँ

[03:27.43] गँवाऊँ वक्त ना वो बीती बातें सोचकर

[03:31.14] कभी रुकूँ ना, चाहे धीमे ही क़दम चलूँ

[03:34.60] मेरी तरह क्या तुम भी खुद को ही तराशते? (तराशते)

[03:37.52] वो गुज़रे वक्त की क्या ग़लतियाँ सुधारते? (सुधारते)

[03:39.37] हाँ, महफ़िलों में अपनी खुशियाँ सारी बाँट के (बाँट के)

[03:42.30] क्या तुम भी रातें सारी तन्हा ही गुज़ारते? (गुज़ारते)